Sunday, 14 August 2011

Girish Chandra Pandey

मैँ ना सही
वो ना सही
तुम ना सही
दिल ना सही
दिमाग ना सही
तन ना सही
मन ना सही
भाषा ना सही
ये ये ये
ये लेखनी तो आजाद है
सोच ना सहीँ
भाव ना सही
ये ये ये
ये रक्त तो आजाद है
देश ना सही
वेश ना सही
सँस्कृति ना सही
प्रकृति तो आजाद है

1 comment:

  1. हम आजादी क्योँ चाहते हैँ
    मनमानी के लिए
    शान से जीने के लिए
    या आन मान सम्मान के लिए
    या
    जीने के लिए
    कुछ पाने के लिए
    या
    असहाय को सताने के लिए
    गरीब को
    चिढाने के लिए
    आखिर क्योँ??े लिए
    या आन मान सम्मान के लिए
    या
    जीने के लिए
    कुछ पाने के लिए
    या
    असहाय को सताने के लिए
    गरीब को
    चिढाने के लिए
    आखिर क्योँ??

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