Thursday, 11 June 2015

माटी की खुशबू

【माटी की खुशबू】

आज माटी की गन्ध
न जाने क्यों
माटी सी नहीं लगी
न वो सोंधापन
न वो अपनापन
आज न जाने क्यों
अजनबी सी लगी

रो रहे थे
ढुंगे डेड़े
झुके सूखे
हिसालू किर्मोड़ों के
कटीले झेकडे
सब कुछ तो मायूस था
बस तेरे सिवा
तू तो चाहता ही था
बदलना प्रकृति को
प्रकृति की
आकृति को
अब खुश हो जा
देख इस विकृति को

झुलस रहे है
हिम खण्ड
फिसल रहे हैं
काल खण्ड
आग उगल रहे हैं मार्तण्ड
विखरे पड़े हैं
इतस्ततः भुजंग
सूखे नदी नाले
गाड़ गधेरे
नौले खोले
जल जंगल
दोनों बन गए हैं शोले

फिर भी साँस ले रहा है
और दे रहा है
बूढ़ा हो चुका पहाड़
बची है अभी
गन्ध माटी में
जिसे ख़त्म करने की साजिस
रच रहे हैं
कुछ ओहदों वाले
जो हदों से पार जाकर
सरहदें खींचने की
पुरजोर कोशिस कर रहे हैं।
क्या खींच पाएँगे
लकीरें
ईर्ष्या ,लोभ,मोह की
जो खुद बंधे है
जकड़े हैं
बँधे हैं
इन बन्धनों से
क्या बचा पाएँगे
माटी की खुशबू

अरे साथियो
चलो बचा लें
इस माटी को
इसकी खुशबू को
इसमें बसे प्राणों को
छान लें
गोड़ लें
फूँक लें
जहर उगलते खर पतवारों को
दुश्मन कीटों को
जोड़ लें
समेट लें
इस माटी की रीतों को

फिर उगेगा
वही सुगन्धित
सत्व जिसे
हम ढूँढ रहे हैं
माटी में
लगेंगी प्रेम की बालें
जिनसे महकेगा
घर आँगन
भरेंगे दिलों के पिटारे
सुवासित होंगे विचलित मन
प्रफुल्लित होंगे
पुष्प परागण
फिर होगी निश्छल
निर्मल माटी की खुशबू

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
11:14am//11/06/2015
©gcp©







Wednesday, 10 June 2015

हल और हलिया

आज खेत में
हलिया
हल बल्द के साथ
गया था
बड़ी निराशा से
जोड़ा था
दो बैलों को
जुए से
हल को हल्यून से
थामा था हथिण्डा
हाथ में सांकड़ी
लगाने चला था
पहला सी
जमीन बहुत सख्त थी
जैसे हमारा नजरिया
फिर भी डाला था
बीज
आशा का
जिसे दरकार थी
कुछ बादलों के गरजने की
बरसने की
न बादल आया
न बरसा
सूखने लगा था
खेत
खलिहान
हल और हलिया

"प्रतीक"गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
©gcp©








Tuesday, 2 June 2015

खोटा सिक्का

°°खोटा सिक्का°°
•••●••••●•••••●•••
एक सिक्का
फैंका था
कटोरे में
कटोरा खूब हँसा था
और नाचा भी था
क्योंकि वह सिक्का पहला था

अल्ला
भगवान के नाम पर
लगभग दस दुआओं को
एक साँस में बोल गया था
तब जाकर
पिघला था
जेब से बटुआ निकला था
हर कोने को टटोला था
मिला था
एक सिक्का
बड़ी दूर से घुच्ची की तरह
डाला था
क्योंकि वह सिक्का पहला था

पूरा दिन यों ही
गुजर गया था
बहुत कुछ समेट लिया था
उन दुआओं के बल पर
जिन्हें उसने
ले जाकर शराब की दूकान में
बेच दिया था
अब वही
दुनिया का सबसे बड़ा बादशाह था
क्योंकि वह निकला सिक्का खोटा था

आज फिर
वही जगह
वही समय और आदमी
वही कटोरा
आज सिक्का नदारद है
नए सिक्के की तलाश में
शाम की आस में
हाँ आज वह बटुए वाला न था
क्योंकि वह सिक्का रूठा था
आदमी झूठा था

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
उत्तराखंड पिथौरागढ़
©gcp



Monday, 1 June 2015

तिनके का सहारा

••सम्हाल लेना••
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
कुछ तिनके जो
उड़ रहे हैं
इन अंधड़ों में
उनको सम्हाल लेना
वही तो किनारे लगाएँगे
तुम्हें और तुम्हारे
डूबते काफ़िले को
क्या उन तिनकों को
सहेज पायेगा

सूना होगा
डूबते को तिनके का सहारा
जिसने डूबने की
ठान ली हो
उसे क्या कोई
तिनका बचा पायेगा

निकला था समन्दर को
लाँघने
क्या इतना आसान है?
पूँछ तो तेरे वंशजों ने
पहले ही घिस डाली
किस पर स्थिर हो
तू इस विशाल
जल थल को नभ् तक
ले जा पायेगा

बिजलियों के चमकने दमकने से
घबराना क्या दर्शाता है
क्या तू भादो के
बादलों की गर्जना और तर्जना को
सुन पायेगा

धीर गंभीर
कहे जाने वाली
वो घटाएँ
आज बोझिल हो
तिलमिला उठीं हैं
क्या इन बदलती
फिजाओं में तू जी पायेगा

जीने का हौसला
मरने का फैसला
इन दोनों के बीच की दूरी
जो अगोचर ही
नहीं अगम भी है
अभेद्य तो नहीं कह पाउँगा
क्या इस गुत्थी को
तू कभी सुलझा पायेगा

जेब में हाथ डालकर
चलना
नदी में हाथ बाँध कर कूदना
ये आत्म हत्या नहीं तो
और क्या है
क्या कभी बंद सांकलो को
खोल पायेगा

अब की बार
तू तिनके को यो न उड़ने देना
अपने विवेक को स्थिर कर लेना
किसी की हुड़कियों से न डरना
मौसम को जाँच लेना
परख लेना
जीने के लिए वो सब कुछ कर लेना
जो तू कर सकता है
हाथों को खुला छोड़
चलना और तैरना |
दिमाग के बंद सांकल खोल लेना
तभी कुछ कर पायेगा
और जी पायेगा

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय "प्रतीक"
उत्तराखंड
©gcp©