Friday, 16 January 2015

गजल

●●●●●●खुद की सोच●●●●●●●●

मौसम के रुख को बदलने की मत सोच
बेहतर होगा, उसमें खुद को ढालने की सोच

फ़िजूल की बातों से, कुछ मिलेगा नहीं
जीने के लिए कुछ पुख्ता करने की तो सोच

बुरे दौर से हर कोई दो चार होता ही है
जो गया सो गया आने वाले वक्त की तो सोच

मत खींच टांग किसी की ,वक्त जाया होगा
पहले अपने मकां को ,घर बनाने की तो सोच

कोई बिचार बुरा, आखिर आये ही क्यों भला
प्रतीक प्रयास कर अच्छा और सच्चा ही सोच

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय(प्रतीक)
बगोटी,चम्पावत,उत्तराखंड
सम्प्रति-कार्यरत पिथोरागढ़ उत्तराखंड
©प्रतीक©
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Friday, 9 January 2015

गजल

●●●●●●फलसफ़ा ●●●●●●●

वो मुझे जीत के भी हारा में ही था
मैं उसे हार के भी तो जीत में ही था

खेला था एक खेल जिन्दगी का मैंने
अरे शुरू तो हुआ पर अधूरा ही था

लोग मुझे अक्सर ,टाल जाते हैं यहाँ
बोले अरे ये परसों तक बच्चा ही था

हुनर को मेरे मेरी उम्र से न देख कभी
अरे तू भी तो कभी माँ के गर्भ में ही था

पक जाते हैं बाल समय से पहले जरूर
इनमें खिजाब लगाना भी हुनर ही था

बच्चे भी कभी ज्ञान भी  तुतलाते ही हैं
उन्हें सिरे से नकारना भी नादानी ही था

नाकाफी है किताबों को यों ही रट देना
जीने के लिए तो ये सब बेकार ही था

अरे जीना है तो खुद को जीत ले प्रतीक
बाकी तो ,जिन्दगी का बस हिसाब ही था

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
डीडीहाट, पिथोरागढ़ ,उत्तराखंड
06:11pm///09/01/15/शुक्रबार
©प्रतीक©






Monday, 5 January 2015

जो मेरा है

●●●●●●●जो मेरा है●●●●●●●●

ख्वाब तू मेरा है और ख्वाब ही रहेगा
रुआब तू मेरा है और रुआब ही रहेगा

सपनों को मेरे कोई चुरा नहीं सकता
सवाल तू मेरा है और सवाल ही रहेगा

क्यों बताऊँ किसी को मंजिल अपनी
जबाब तू मेरा है और जबाब ही रहेगा

सफाई क्यों देनी है अपने होने की तुझे
खयाल तू मेरा है और खयाल ही रहेगा

जज्बात मेरे हैं कोई उनको बदल न सके
अंदाज तू मेरा है और अंदाज  ही रहेगा

कुछ प्रश्न उछले हैं तेरे  शौक पर आज
प्रतीक तू मेरा है और प्रतीक ही रहेगा

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
04:59pm//04/01/15
©प्रतीक©

Saturday, 3 January 2015

Jaane ke baad

●●●√√√√√√√जाने के बाद√√√√●●●●●
जिक्र आया उसका उसकी मौत के मातम पर
नाम आया उसका उसकी मौत के मातम पर

हर कोई ढूँढ रहा था उसे,उसके हर सामान में
सामान बोल रहा था उसकी मौत के मातम पर

कद्र नहीं की अपनों ने भी जिन्दा था वो जब तक
आज चीख रहे थे अपने भी उसकी मौत के मातम पर

माँगता रहा दो रोटी वो न पसीजा दिल उनका
आज बाँट रहे पूडी पकौड़ी उसकी मौत के मातम पर

तरस गया था तड़फ गया था जीने के खातिर
प्रतीक जीने का सामान जुड़ा है उसकी मौत के मातम पर

डॉ गिरिश पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
Meree daayaree ke panne se
01:23pm//03//1//14
©gcp©

Friday, 2 January 2015

असमान रेखाएँ

●●असमान रेखाएँ●●

एक रेखा खींची है हमने
अपने मनोमस्तिष्क में
नाप लिया है हमने इंच दर इंच
अपने पैमाने से
क्या नापा और कैसे नापा हमने
ये बताना मुश्किल है
अगम ही नहीं
अगोचर भी है वो रेखा
जो खिंच चुकी है हजारों वर्ष पहले
उसको मिटाने की जद्दो जहद
आज कल खूब चल रही है
बड़े बड़े लोग उनकी बड़ी बड़ी बातें
पर काम वही छोटे
सोच वही संकीर्णता के दल-दल में फँसी और धँसी हुई
रेखा जस की तस
और गहरी और विभत्स होती हुई
और लम्बाई लेते हुए
दीवार को गिराना आसान है
पर दिलों में पड़ी दरार को पाटना बहुत मुश्किल
जातियों वर्गों के बीच की काली रेखाएं
अब रेखाएं नहीं
अब तो सत्ता तक पहुचने का कुमार्ग बन चुकी हैं
हर पाँच साल बाद
फिर रँग दिया जाता है
इन रेखाओं को
अपने-अपने तरीके से
अपनी सहूलियत के रँग में
कभी दो गज इधर
कभी दो गज उधर
बनी रहती है रेखा जस की तस
अपनी जगह पर
हाँ कुछ वर्षौ से एक छटपटाहट देखी गयी है
रेखा के आर-पार
मिटाने की कवायद जारी है
वर्षौ से खिंची रेखा को मिटाने
लगेंगे वर्षौ
ये कोई गणित के अध्यापक की रेखागणित नहीं
जिसे जब चाहो
वर्ग बनालो
जब चाहो आयत बना लो
जब कब चाओ त्रिभुज बनालो
जब चाहो वृत बनालो
ये तो अदृश्य है
समाज के इस छोर से उस छोर तक
अविकसित से विकसित तक
हर जगह व्याप्ति है इसकी
ये रेखाएं
जल,जमीन,जंगल
सब जगह
इसको मिटाना ही होगा
हम सबको अपने दिलों से दिमाग से
समाज से
आओ सब मिल संकल्प लें
इस नये वर्ष में दूरियाँ कुछ कम करें

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
उत्तराखंड
08:47am//02//01//15
©gcp©