●●●●●●फलसफ़ा ●●●●●●●
वो मुझे जीत के भी हारा में ही था
मैं उसे हार के भी तो जीत में ही था
खेला था एक खेल जिन्दगी का मैंने
अरे शुरू तो हुआ पर अधूरा ही था
लोग मुझे अक्सर ,टाल जाते हैं यहाँ
बोले अरे ये परसों तक बच्चा ही था
हुनर को मेरे मेरी उम्र से न देख कभी
अरे तू भी तो कभी माँ के गर्भ में ही था
पक जाते हैं बाल समय से पहले जरूर
इनमें खिजाब लगाना भी हुनर ही था
बच्चे भी कभी ज्ञान भी तुतलाते ही हैं
उन्हें सिरे से नकारना भी नादानी ही था
नाकाफी है किताबों को यों ही रट देना
जीने के लिए तो ये सब बेकार ही था
अरे जीना है तो खुद को जीत ले प्रतीक
बाकी तो ,जिन्दगी का बस हिसाब ही था
डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
डीडीहाट, पिथोरागढ़ ,उत्तराखंड
06:11pm///09/01/15/शुक्रबार
©प्रतीक©
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