Saturday, 21 February 2015

तंग

तंग गलियों सी तंग सोच रखने वालो
मरे बकरों की रोज टाँग खींचने वालो

कभी आईने से हटकर खुद को देखा है
घंटों आईने पे ओ! सजने सँवरने वालो

चले आते हो नुक्कड़ पर दर्द छुपाने को
सुधर जाओ इधर की उधर करने वालो

क्या ढूंढते हो ?किसी की मजबूरियों में
अपनी कमजोरियों को ओ! छुपाने वालो

फैंक डालो बिष की थैलियाँ जुबाँ वाली
हर वक्त जुबाँ से ओ!आग उगलने वालो

प्यार लेना और देना सीखले तू "प्रतीक"
जरा सोच लो ओ!मेरा धुआँ देखने वालो

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय (प्रतीक)
डीडीहाट,पिथोरागढ़,उत्तराखंड
रविबार~22/02/2015~05:37am
©gcp©


Tuesday, 10 February 2015

वफ़ादार

()वफादार()

वो रो रही थी
चौराहे पर
कुत्तों से घिरी थी
आदमी से ज्यादा बफादार
कुत्ते होते है
वो सोयी थी उनके साथ रात भर
सुबह उठकर पाती है खुदको
उनसे घिरा हुआ
और वो चिल्लाती है जोर जोर से
मुझे बचाओ
उन कुत्तों से जो इनको पालते हैं
मुझे दुत्कारते हैं
बेजुबान हिलाता हुआ कान
कुछ कहता हुआ
खड़े करके पूंछ और कान
मानो कह रहा हो
मैं हूँ ना
भोंकता हुआ
कहता हुआ
मत रो

कुछ लोग थे जो
जुबान होकर भी थे बेजुबान
जो थे जिन्दा गोश्त की तलास में
सुबह होते ही
जो पहन लेते हैं
तरह तरह के लिवास
बदल लेते हैं
चेहरे के रँग
हाथ की हाथ को न बताने वाले
घडियाली आँसू रोने वाले

आज रात
वही स्वान समूह
ढूँढ रहा था
उस घोषित पगली को
जो आज नदारद थी
उस चौराहे से
सूना है
उसने एक नवजात को जना है
उस सरकारी अस्पताल में
जहाँ कुत्तों के लिए कोई जगह न थी

पुच्कार और दुलार रही थी
मुस्कुरा रही थी
उस नवजात को देखकर
जो पाया था उसने
उस चौराहे से
न जाने कब किसने लूटी थी अस्मत उसकी
वो भूल गयी थी
क्योंकि वो पगली थी

उसे कोई आभास न था
उसका बाप कौन था
किसने यह अनचाहा बीज रोपा था
हाँ उसे उसने पाला था
जूठा पीठा
सड़ा गला खाकर
पूरे नौ माह तक
बिना किसी स्वार्थ के

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय(प्रतीक)
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
02:29pm//10/02/2015
©gcp©