°°रेंगता ज्ञान°°
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तेरे ज्ञान को
रेंगते हुए देखना
मुझे सोचने को
मजबूर करता है
उससे अच्छा तो वो
रेंगने वाला है
जो कभी भी
जानबूझकर वार नहीं करता
तूने तो
उन फनों को भी मात दे दी
जो तुझे फनकार कहते हैं
आज बिलों से निकले जो फन हैं
फुंफकार तो पा नहीं रहे
बस लपलपा रहे हैं
डर लगता है
इस गर्मी में
उन फनकारों से
जो निकल पड़े हैं
विषबमन करने
घरों से गली की ओर
जो तिलमिलाए हुए हैं
बच कर रहना हसीनों
निकल पड़े हैं
डसने नाग
बीन पर नाचने की आदत
अब बहुत लोगों में दिखने लगी है
जो इंतजार में हैं
कोई बजाये तो सही
उस धुन को
जो बजाई थी
रेंगते सपेरे ने
आज तो सपेरा
खुद साँप बन बैठा है
गाँव में जो खोया था
उसे
लाठी लिए घूम रहे हैं
शहर वाले
जो छुपा है
न जाने किस अन्धकार में
किस अज्ञान
अविद्या के डेरे में
ज्ञान है की रेंगते हुए
पहुँच चुका है
और फँस चूका है
फनकारों के बिलों में
ज्ञान तेरा हो चाहे मेरा
है तो
कठोर ही
जिसे भिगोना भूल गए हम
दिल की चासनी में
आँखों के पानी में
बाणी की मिठास में
मन की सुगन्ध में
हम तो ढूँढ
रहे है उसे तन के ज्वार भाटों में
रेंगना तो है ही
ऐसे ज्ञान को
"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
10:08am//३१\०५\२०१५
©gcp