Saturday, 30 May 2015

रेंगता ज्ञान

°°रेंगता ज्ञान°°
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तेरे ज्ञान को
रेंगते हुए देखना
मुझे सोचने को
मजबूर करता है
उससे अच्छा तो वो
रेंगने वाला है
जो कभी भी
जानबूझकर वार नहीं करता

तूने तो
उन फनों को भी मात दे दी
जो तुझे फनकार कहते हैं
आज बिलों से निकले जो फन हैं
फुंफकार तो पा नहीं रहे
बस लपलपा रहे हैं

डर लगता है
इस गर्मी में
उन फनकारों से
जो निकल पड़े हैं
विषबमन करने
घरों से गली की ओर
जो तिलमिलाए हुए हैं
बच कर रहना हसीनों
निकल पड़े हैं
डसने नाग

बीन पर नाचने की आदत
अब बहुत लोगों में दिखने लगी है
जो इंतजार में हैं
कोई बजाये तो सही
उस धुन को
जो बजाई थी
रेंगते सपेरे ने
आज तो सपेरा
खुद साँप बन बैठा है

गाँव में जो खोया था
उसे
लाठी लिए घूम रहे हैं
शहर वाले
जो छुपा है
न जाने किस अन्धकार में
किस अज्ञान
अविद्या के डेरे में
ज्ञान है की रेंगते हुए
पहुँच चुका है
और फँस चूका है
फनकारों के बिलों में

ज्ञान तेरा हो चाहे मेरा
है तो
कठोर ही
जिसे भिगोना भूल गए हम
दिल की चासनी में
आँखों के पानी में
बाणी की मिठास में
मन की सुगन्ध में
हम तो ढूँढ
रहे है उसे तन के ज्वार भाटों में
रेंगना तो है ही
ऐसे ज्ञान को

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
10:08am//३१\०५\२०१५
©gcp



Friday, 29 May 2015

गज़ल

झूठ पर झूठ बोलकर,झूठ को सह दिया न करो
हर जगह झूठ के किस्से,अपने कह दिया न करो

लूटकर चल दिये हमको, पलटकर देख भी लो तुम
किसी की बेरुखी को तुम,यों ही सह लिया न करो

खबर थी आशियाने में लगी है आग उसके भी
हर जगह बिन बुलाये ही ,यों ही चल दिया न करो

शहर में आज कोई भी सच को सुन नहीं सकता
गुस्ताखियों को अपनी, यों ही बल दिया न करो

बात को मत बना इतना बतंगड़ बन गए हो तुम
जिन्दगी आज की है ये ,प्रतीक कल जिया न करो

ड़ॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय 【प्रतीक】
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
11:49am//30//05//2015
©gcp©

कायर हो तुम

©कायर हो तुम©

ये इंजेक्शन
दवाइयाँ
आपरेशन
और भी न जाने क्या क्या
और इससे चूक गयी
तो फिर
अबोर्शन

कसम खाई है क्या
मुझे खोकला करने की
पहले नोचा
फिर सोचा
और कोख की
दुश्मन बन चुकी
अल्ट्रासाउंड मशीन डायन
अन्ततो मुझे ही कोसा

काया की माया
पहले खूब लुटाया
प्यार,दुलार ,पुचकार
आज फैला क्यों
ये दिलों में अन्धकार
कहाँ गया
स्नेहिल दुलार

सारे के सारे
त्यागपत्र मुझे ही क्यों देने पड़ते हैं
जिस गुनाह की
गुनाहगार मैं नहीं
उसकी सजा मुझे ही क्यों
और मुझे तो
जमानत भी नहीं देता कोई
चस्मदीद भी मुकर जाता है

मेरे वजूद से ऐसा क्या
खतरा है
जो मुझे मिटाना चाहते हो
गर्भ में ही
अरे इतना भी मत डरो कायर

"प्रतीक"डॉ गिरीश
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
©gcp

Thursday, 28 May 2015

गज़ल

दूर को पास से देखा तो जो समझ आया
पास थे जो उनको हमने आज दूर पाया

फासले यों बड़े कि उनसे मिले साल हुए
अजनबी आज कोई मेरे आस पास आया

बसी थी दिल में तस्वीर वो जुदा निकली
उठी थी एक लपट जो उसे भी राख पाया

गुमाँ था होने का जिसके वो बेवफा निकला
भुला दिया था हमने वो याद साथ लाया

दिलों का खेल भी क्या खेल जिसे खेल गया
प्रतीक जिन्दगी का खेल मुझे रास आया

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
09:57am/29///05///2015
©gcp

Wednesday, 27 May 2015

मुक्ति की आकाँक्षा

°°मुक्ति की आकाँक्षा°°
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बहुत कुछ था
जो जकड़े था मुझे
आज खुद ही छोड़ गया
और कुछ मैंने छोड़ दिया

अब मुक्त हूँ
उन उलझनों से
जो बाँधे थीं
न जाने कब से
आज गाँठो को खोल दिया

विपरीत दिशा
और दशा
जिसमें ही तो जीवन है कसा
चल पड़ा हूँ
नदी धारा के ठीक उलट
प्रवाह में
तैरना छोड़ दिया
अपने माँझी को बोल दिया

मुकद्दर की गाड़ी में बैठकर
मंजिल की आशा को
आज छोड़ दिया
मेहनत की
पैदल सवारी को हाथ दिया
अपने साहस को जोड़ दिया
आज खुद को मोड़ दिया

देखना है
कितना मुक्त हो पता हूँ
अपनी इन
उलझनों से
जिन्हें छोड़ने का साहस जुटाया है
आज बन्द कपाटों को
खोल दिया

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
उत्तराखण्ड©gcp