Thursday, 28 May 2015

गज़ल

दूर को पास से देखा तो जो समझ आया
पास थे जो उनको हमने आज दूर पाया

फासले यों बड़े कि उनसे मिले साल हुए
अजनबी आज कोई मेरे आस पास आया

बसी थी दिल में तस्वीर वो जुदा निकली
उठी थी एक लपट जो उसे भी राख पाया

गुमाँ था होने का जिसके वो बेवफा निकला
भुला दिया था हमने वो याद साथ लाया

दिलों का खेल भी क्या खेल जिसे खेल गया
प्रतीक जिन्दगी का खेल मुझे रास आया

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
09:57am/29///05///2015
©gcp

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