दूर को पास से देखा तो जो समझ आया
पास थे जो उनको हमने आज दूर पाया
फासले यों बड़े कि उनसे मिले साल हुए
अजनबी आज कोई मेरे आस पास आया
बसी थी दिल में तस्वीर वो जुदा निकली
उठी थी एक लपट जो उसे भी राख पाया
गुमाँ था होने का जिसके वो बेवफा निकला
भुला दिया था हमने वो याद साथ लाया
दिलों का खेल भी क्या खेल जिसे खेल गया
प्रतीक जिन्दगी का खेल मुझे रास आया
"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
09:57am/29///05///2015
©gcp
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