Wednesday, 27 May 2015

मुक्ति की आकाँक्षा

°°मुक्ति की आकाँक्षा°°
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बहुत कुछ था
जो जकड़े था मुझे
आज खुद ही छोड़ गया
और कुछ मैंने छोड़ दिया

अब मुक्त हूँ
उन उलझनों से
जो बाँधे थीं
न जाने कब से
आज गाँठो को खोल दिया

विपरीत दिशा
और दशा
जिसमें ही तो जीवन है कसा
चल पड़ा हूँ
नदी धारा के ठीक उलट
प्रवाह में
तैरना छोड़ दिया
अपने माँझी को बोल दिया

मुकद्दर की गाड़ी में बैठकर
मंजिल की आशा को
आज छोड़ दिया
मेहनत की
पैदल सवारी को हाथ दिया
अपने साहस को जोड़ दिया
आज खुद को मोड़ दिया

देखना है
कितना मुक्त हो पता हूँ
अपनी इन
उलझनों से
जिन्हें छोड़ने का साहस जुटाया है
आज बन्द कपाटों को
खोल दिया

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
उत्तराखण्ड©gcp





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