Saturday, 21 February 2015

तंग

तंग गलियों सी तंग सोच रखने वालो
मरे बकरों की रोज टाँग खींचने वालो

कभी आईने से हटकर खुद को देखा है
घंटों आईने पे ओ! सजने सँवरने वालो

चले आते हो नुक्कड़ पर दर्द छुपाने को
सुधर जाओ इधर की उधर करने वालो

क्या ढूंढते हो ?किसी की मजबूरियों में
अपनी कमजोरियों को ओ! छुपाने वालो

फैंक डालो बिष की थैलियाँ जुबाँ वाली
हर वक्त जुबाँ से ओ!आग उगलने वालो

प्यार लेना और देना सीखले तू "प्रतीक"
जरा सोच लो ओ!मेरा धुआँ देखने वालो

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय (प्रतीक)
डीडीहाट,पिथोरागढ़,उत्तराखंड
रविबार~22/02/2015~05:37am
©gcp©


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