Tuesday, 30 December 2014

जाग

●●●●●√उठ नौजवान√●●●●●●●

चल उठ जा अरे ओ!!देश के नौजवान
तू ही है इसकी आन, मान और शान
लिखदे गौरव गाथा अपनी भुजाओं से
बन जा तू इस भारत वर्ष की पहिचान

कलम उठे तो लज्जित हो उसकी तलवार
सीमाओं पर तेरे शीने की इज्जत हो शानदार
लहूँ तेरा बन जाय जीवन रेखा भारत की
दुश्मन का मन दहल जाये हो जाये खबरदार

मृत्यु तुझे डिगा न पाए ,कर सबको हैरान
भय पैदा कर शत्रु दल में ,पर मत बनना हैवान
प्यार तेरे दिल में हो ,नारियल सा स्वाभिमान
मत भूलना, फर्ज है तेरा भारत माँ  सम्मान

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
30//12//14//06/30pm
©गिरीश©

कविता

सभी मित्रों को आने वाले वर्ष 2015 की शुभकामनाएं
●●●●क्या खोया क्या पाया●●●●

जहाँ शुरू हुई थी गोया वहीँ पूरी होगी
जिन्दगी कभी मेरी, कभी उसकी होगी

रोया था जब आया था तू इस जमी पर
जायेगा जब सबके आंखों में नमी होगी

फूल बरसेंगे तेरे कामों के लिए हरदम ही
तेरे जाने के बाद ये तेरी भी महक होगी

कभी रोया होगा तो कभी हँसा भी होगा
जिनके लिए रोया,उनके होठों में हंसी होगी

हमेशा जिन्दगी एक सी होती नहीं यहाँ
कभी धूप तो जिन्दगी, कभी छाया होगी

खट्टी मीठी यादें ही जीने का जरिया हैं
जिन्दगी कभी ख्वाब ,कभी हकीकत होगी

बीत गए वर्षों जैसे ये साल भी जा रहा है
पकड़ ले रास्ता प्रतीक,मंजिल भी तेरी होगी

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
04:18pm//29//12//14/सोमबार
©prateek©



Wednesday, 24 December 2014

खुशी

सभी को क्रिसमस की बधाई
●●●●●●●●खुश हो आज●●●●●●●●

बहुत खुश है आज, रँग खिला खिला सा
कुछ तो खाश है आज ,सँग घुला मिला सा

जिन्दगी इतनी खूबसूरत!, देखा पहेली सी
बहुत कुछ है आज,देखा पतंग उड़ी उड़ी सी

बाँट ले प्यार की बूंटी,दिल महक जाएगा
कुछ तो राज है आज,आँखे हैं जगी जगी सी

खिलखिला रहा है आसमां,जमी को देखकर
धुप खिली है आज,महकी है कली कली सी

बाँट रहा है उपहार कोई ,प्यारे बच्चों को √√
जुदा जुदा है अंदाज,खुशी है खिली खिली सी

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
03:25pm//24//12//14
©gcp©




Tuesday, 23 December 2014

भूख

●●भूख रेस्टोरेंट में●●

वो चित्र को देख रहा था
और बार बार थूक निगल रहा था
उस रेस्टोरेंट के विशाल काय होर्डिंग पर
छपे पिज़्ज़ा,बर्गर,डोसा
और भी न जाने क्या क्या
वो बस देख ही सकता था
दूर से ही
नजदीक कौन आने देता उसे
क्योकि वो भूखा था और साथ में नंगा भी
पर देखता जरूर था
रोज
क्योंकि उस रेस्टोरेंट के ग्राहक ही
उसके भी जीवन के वाहक थे
कोई डकार मारकर फटकार जाता
कोई एक सिक्का खनकाकर
रहम कर जाता
और ना जाने क्या क्या बुदबुदाकर नाक भींचकर आगे बढ़ जाता
और नसीहत भी दे जाता
कुछ काम करो
वो कहता अरे भाई ये भी तो काम ही है
ऐसे भूखे नंगों की जेब से एक सिक्का निकालना
आसान है क्या
ये क्या जानें वास्तव में नंगापन होता क्या है
रोटी कपड़ा
यही तो है असली रगडा
राजनीती कूटनीति के बड़े बड़े दावे इसी के आस पास पाए जाते हैं
वाह वाही लूटने का सबसे सस्ता हथकंडा
दुसरे को भूखा नंगा कहना आसान है
वो आज बहुत खुश था
न जाने क्यों
पता चला आज मंगल बार था
बगल के मंदिर में हनुमान जी भक्तों का ताँता लगेगा
दिन भर भूखे रहकर
जिसे ब्रत भी कहते हैं
उसका फल प्राप्त हो इसलिए
बूंदी का प्रसाद चढाने
आज तो पेट भी खुश हो जाएगा
हफ्ते में एक दिन कुछ मीठा खाने का अवसर
मीठा सुनने का नहीं
सिक्कों की खनखनाहट
घंटियों की टन टन
कानों को न जाने भाती नहीं
बगल से आती अजान की आवाज
गुरुबानी ये सब
भूख को अच्छे नहीं लगते
उसे तो चाहिए
अन्न जल कण
वो किसी धर्म संप्रदाय जाती का क्यों न हो
वो फिर देखने उस चित्र में
ना जाने क्या
बहुत कुछ था उसमे जो उसे नहीं
उसके उदर पूर्ती को चाहिए था
जब वो ये सब सोच रहा था आसमान को देखकर
असमान हो गया था उसका चेहरा
जब नीचे देखा तो
जो बचा भी था
वो भी अब उसके पास न था
कोई स्वान बगल में बैठकर पूँछ हिला रहा था
और वो उसे देखकर
बहुत देर तक हँसता रहा
हँसता रहा हँसता रहा
शायद वो अब भी हंस रहा हो

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
08:38pm//23//12//14
©प्रतीक©

Monday, 22 December 2014

केमरे का सच

●●केमरे पर सच●●

वो बैठकर बतिया रहे थे
केमरा ऑफ़ था
उस समय स्टूडियो का
बात बहुत गम्भीर थी
लगा कितने अच्छे हैं ये लोग
कितना सोचते हैं
ये सब देश दुनियां के बारे में
जैसे ये सच उगलना चाह रहे हों
पार्टी से उपर उठकर
नैतिकता की दुहाई दे रहे थे सब
लगा देश में बड़े विचार शील लोग विचरण करते हैं
कोई नहीं रोक सकता
भारत को विश्वगुरु बनने से
पर विडम्बना
एक घटना ने
बदल दिए
सारे समीकरण
बाणी और बदन के
मायने निकलने लगे चिन्हों के
रस टपकने लगा झंडों से
झंडों के रंग जुबान को रंगने लगे
सब राग अलापने लगे
खुद को बताने लगे बीतराग
घटना थी
केमरे का ऑन होना
और नेतिकता का ऑफ़ होना
जाग गयी थी
छठी इन्द्रीय उस होस्ट की
दाग रहा था
प्रश्नों के हथगोले
लगा आज तो खुलेगी कलई
सांपों की तरह बिष बमन जारी था
जो पहले सपेरे लग रहे थे
वो खुद सांप बन गए थे
बारूद तो इतना भरा था की
जैसे देस अपनी सीमओं की रक्षा हेतु यहीं से लिया जाता है बारूद
बात शुरू हुई गरीबी की
एसी में बैठकर
सामने रखा चिकन बिरयानी
बात हो रही थी भुखमरी की
सब कुछ
कथनी और करनी में फर्क कर रहा था
बातें जो केमरे के पीछे हुईं थीं
वो बहुत पीछे छूट गयीं थीं
इतना पीछे की
कहीं केमरे न सुन ले असलियत को
इतना डर था
अरे भाई सुन भी लिया तो
एडिट वाला आप्सन तो है ही ना
तो डर कैसा
बड़ा मजा आता है इनको
केमरे के सामने
भुखमरी,गरीबी,बेरोजगारी
और तो और मौत तो सबसे बड़ा मसाला है
केमरे के लिए
इस देस में जनता को कब तक बेवकूफ समझा जाएगा
एक बात बता दूँ
अब मैं अर्थात जनता अब बेवकूफ नहीं
ये पब्लिक है सब जानती है

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
01:38pm//22//12//14//सोमबार
©प्रतीक©

Sunday, 21 December 2014

फिर भी तू मेरा

●●●●●●●फिर भी तू मेरा●●●●●●●●●●

तू भूल गया मेरे हाथों की रोटी को तो मैं क्या करूँ
तू डोल गया जिन्दगी की आँधी में,तो मैं क्या करूँ

पल्लू की गाँठ आज भी बँधी रहती है तेरे लिए
तू खोल नहीं पाया मन की गाँठ तो मैं क्या करूँ

शाम होते ही नाम तेरा आ ही जाता है एक बार
तू मेरे नाम को ही भूल गया तो मैं क्या करूँ

जिया है तुझे वर्षों से अपनी यादों में हर दम
तू अब उनमें न रहना चाहे तो उनका मैं का क्या करूं

रीझा करता था मेरी आहट पर कभी तू याद कर
अब खीजा करता है,मेरे साये से तो मैं क्या करूँ

तेरा तुतलाना तेरा बचकाना रह रह के गुदगुदाता है मुझे
अब तेरा बचपन,बड़कपन में बदल गया तो मैं क्या करूँ

बहुत कुछ था तेरे मेरे बीच में जो कह नहीं सकते
प्रतीक उनमें से कुछ न रहा तेरे पास तो मैं क्या करूँ

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
उत्तराखंड पिथोरागढ़
06:45am//21//12//14
©प्रतीक©

Saturday, 20 December 2014

दीवार दिल की


●दीवार दिल की●

चाहर दिवारी में लगे फूलों फलों
की सुगंध और स्वाद
पूछती नहीं दीवार को
जो दीवार से बंधे दिल हैं न
उनमें खडी दीवार
अभेद्य ही नहीं अदृश्य भी है
पेड़ के पत्ते भी गिरते ,और फडफडाते हैं
मेरे ही आँगन में हैं
ये दिल की दुरियाँ, इन पत्तों को नहीं रोक सकती
हाँ पेड़ ही कट जाय तो बात अलग है
सरहदों पर जो गोलियां चलती हैं
वो नहीं पूछती
बन्दूक तेरी या मेरी
जान की कीमत उस घोड़े को क्या पता
जो चलता है
दूसरे की अंगुलियों से
बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से आय
सुना ही है या गुना भी है कभी
उन बच्चों से क्या पूछें
जो चले गए
इस दुनिया से रो रो कर
विलखते हुए
तेरी हदों का असर हमारी सरहदों
पर तो पड़ता ही है
क्या करोगे अब
जब भस्मासुर एक नहीं अनेक हों
जिनको बरदान ,जीवन दान भी
तूने ही दिया हो
अभी भी समय है
अपने बागों में फलदार पेड़ लगाओ
हथगोले,बन्दूक,और गोलियों की फसल नहीं
मत बनाओ मानव को, मानव का दुश्मन
घरों को घर बनाओ
ताबूत और कब्रगाह नहीं
स्कूल ,स्कूल ही रहें
बिषबमन के अड्डे नहीं
तालीम जीने की दो
जिन्दा जलाने की नहीं
मत बाँटो जहर से भरी रेवड़ियों को
जरा बाँट लो प्रेम को
अपने नापाक इरादों को त्याग दो
नहीं तो एक दिन अपने वजूद को ढूढना मुश्किल होगा
तू खुश रहेगा तो पड़ोसी भी खुश रहेगा
समझे ना

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
डायरी के पन्ने
©प्रतीक©




Sunday, 14 December 2014

सम्पादक महोदया को प्रणाम।इस सेवा को स्वीकार करने का कष्ट करें ।
यह रचना नितांत मौलिक है
●चीखता चित्र ●

कुछ चित्र मजबूर कर देते हैं
सोचने को
विवश कर देते हैं
कलम थामने को
भाव उद्वेलित हो जाते है
एक पीड़ा जो
एक टीस
एक दर्द भरी आह मजबूर है
फूट फूट कर रोने को
जज्बात पिघल जाते हैं
पत्थर दिलों के भी
अगर एसा है तो
ये बुढ़ापा ऐसे क्यों पड़ा है
सड़क किनारे
पिस जाने को
कहाँ गए प्रेम के गीत
कहाँ हैं आज वो गुलाब की पंखुड़ियाँ
क्या वो एक मात्र जरिया थे
देह को पाने को
कहाँ हैं वो लाडले
जिनकी नहीं होती थी रात
नहीं होता था दिन
इस माँ के बिना
जीने की तम्मना किसको नहीं होती भला
सलाम है इस जज्बे को
जो इस जीवन को बनाये रखने के लिए
लगाये हुए है जी जान
कौन देगा रोटी
कौन देगा कपड़ा
है कोई फ़रिश्ता इस चित्र को
बदलने की क्षमता रखने वाला
ये तो एक बानगी है
हिंदुस्तान ही नहीं
विश्व के हर कोने में
मिल जायेंगी ऐसी जिन्दी लाशें
जिन्हें जिन्दा रहते पहनने को लत्ता नहीं
खाने को रोटी नहीं
मरने के बाद के कफन का एक हिस्सा
जिन्दा रहते मिल जाता तो
चिता की तपिस का क्या करना
एक लकड़ी मिल जाती सहारे के लिए
कुछ जलाने के लिए
कुछ पकाने के लिए
पेट में तो अब आग रही नहीं
देह की आग तो अब जलने से रही
रिश्ते जो ढूंढते हैं
वो मुझमें बचा नहीं
ना चमड़ी ना दमड़ी
कुछ बचा नहीं, नोचने को
खसोटने को
बस बचा है तो
ये खोकला हड्डियों का ढांचा
जिसे कोई ढोना नहीं चाहता
न रिश्ते न भाव न प्रेम न वासना
सब के लिए हो चूका यह देह निरर्थक
बस सार्थक है आज ,मेरी मजबूरी
जो मुझे जिन्दा रहने के लिए
उर्जा दे रही है

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड

●नदी से भाव●

बह रही थी नदी
पाहनों से टकराते हुए,
छलकते हुए
कुछ ऐसे ही थे मेरे भाव
जो टकरा रहे थे
उन बिडंबनाओं से
उन रुढियों से
जो मुझे मानव होने से रोकती हैं
देखता हूँ इस नदी की गती
जो बह रही है
अपनी चाल पर
पर कुछ किनारे बदल रहे थे
उसकी ढाल
मजबूर कर रहे थे
रास्ता बदलने को
जैसे मुझसे कोई कह दे
तेरा रास्ता तू नहीं
कोई और बनाएगा
नदी चली जा रही है।
बिना किसी की परवाह करे
अगले पड़ाव को पार करने की होड़
हर जल बिंदु मचल रही हो जैसे
सागर में समा जाने को।
उस सागर में
जहां उसका अस्तित्व ,ना के बराबर होगा।
फिर भी चाहिए उसे मंजिल
अपने को समर्पित कर देना
आसान नहीं है
मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं
नदी का वेग बढ़ता चला गया
ज्यो ज्यों घाटी नजदीक आने लगी
कुछ यों ही मेरे भाव भी उतावले थे
उस समतल को पाने के लिए
जहाँ सब समान हों
जहाँ कोई किसी का रास्ता न रोके

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड

●मुक्ति जो मिलती नहीं●

जो ये मेरे माथे के बल है ना
इन्हें मजबूरी मत समझना
बहुत कुछ है इनके पीछे
जो कहा नहीं जा सकता
जो ये मेरे चेहरे की झुर्रियाँ हैं ना
इन्हें हलके में मत लेना
ये बुढापा तो है ही
इन झुर्रियों के पीछे जो इतिहास हैं ना
शब्दों में नहीं कहा जा सकता
जो ये झुकी कमर देख रहे हो ना
इसे यों ही ना नकार देना
तुझे ढकते ढकते ही तो झुकी है
कुछ उम्र का बोझ भी है
फिर भी झुकना तो मेरे संस्कारों में रहा है
जिसे कूबड़ नहीं कहा जा सकता
जो ये लाठी है ना
ये तो वही कर रही है
जो तुझे करना है
अफ़सोस तू लाठी भी नहीं बन सकता
आज जिस देह की गंध बुरी लगती है ना
उसी देह में तुझसे पुष्प खिले
में गुलकंद नहीं बन शकती
अगर बन पाती
तो शायद तू इस तरह दुत्कारता नहीं
मैं आज भी बाँध लाती हूँ
गुड़ की डली
इस फटी धोती के आंचल में
पर अब तू उस तरह मेरे पास नहीं आता
जिस तरह बचपन में आता था
तुझे पता है
एक दिन सबको इसी रस्ते जाना है
इन सब दुश्वारियों से गुजरते हुए
मैं ना जाने क्यों
भीख माँगती हूँ
पर आज तेरे लिए नहीं
अपनी मुक्ति के लिए

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक

परिचय-डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय( प्रतीक)
ग्राम- बगोटी पो-बगोटी चम्पावत
सम्प्रति-शिक्षा विभाग उत्तराखंड में अध्यापन कार्य में संलग्न।
प्रथम काव्य संग्रह-आईना प्रकाशित
अन्य-क्षेत्रीय,राष्ट्रिय पत्र पत्रिकाओं में लेख व कविताएँ प्रकाशित।














Saturday, 13 December 2014

जबाब चाहिए

●●जबाब चाहिए●●

हिसाब कौन देगा मुझे
मेरे बचपन की यादों का
हिसाब कौन देगा मुझे
मेरे छुटपन की बातों का

खो दिया मैंने खुद को
इन बंद कमरों के अंधेरे में
जबाब कौन देगा मुझे
मेरे सपनों के इरादों का

ह़ोस आया है जब से मुझे
पाया है खुद को इन पिजडों में
हिसाब कौन देगा मुझे
स्याही से पुती उन किताबों का

कौन कहता है मुझे अधिकार है
पढने लिखने और जीने का
जबाब कौन देगा मुझे
सडकों में बिखरे मेरे ख्वाबों का

बाँट दिया ज्ञान को भी
सरकारी और प्राइवेट की थैलियों में
हिसाब कौन देगा मुझे
बालमन की उन क्यारियों का

बहुत कुछ बोला है लोगों ने
मेरी इस मासूमियत पर
जबाब कौन देगा प्रतीक
मेरे इन छूटे हुए प्रश्नों का

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
रविबार//08:07am//14//12//14
©प्रतीक©


करीब आओ

●●●●●●●करीब आओ●●●●●●●●●

क्यों दूर हो तुम हमसे, जरा करीब आओ
क्यों मजबूर हो खुद से, जरा करीब आओ

न भागो यों महफिल से,अंगुलियाँ उठेंगी
क्यों बेजार हो हमसे, जरा करीब आओ

ये आँखें बोल देती हैं सच, दिल का जरूर
क्यों बेखबर हो खुद से,जरा करीब आओ

मत कुरेदो जमीं को,बहुत शख्त है ये जमीं
क्यों खंजर हो खुद के,जरा करीब आओ

मत बहाओ आँसू ,बीते हुए कल के लिए तुम
क्यों अन्दर हो प्रतीक,जरा बाहर तो आओ

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
01:15pm//13/12/14
©प्रतीक©

Friday, 12 December 2014

चीखता चित्र

●चीखता चित्र ●

कुछ चित्र मजबूर कर देते हैं
सोचने को
विवश कर देते हैं
कलम थामने को
भाव उद्वेलित हो जाते है
एक पीड़ा जो
एक टीस
एक दर्द भरी आह मजबूर है
फूट फूट कर रोने को
जज्बात पिघल जाते हैं
पत्थर दिलों के भी
अगर एसा है तो
ये बुढ़ापा ऐसे क्यों पड़ा है
सड़क किनारे
पिस जाने को
कहाँ गए प्रेम के गीत
कहाँ हैं आज वो गुलाब की पंखुड़ियाँ
क्या वो एक मात्र जरिया थे
देह को पाने को
कहाँ हैं वो लाडले
जिनकी नहीं होती थी रात
नहीं होता था दिन
इस माँ के बिना
जीने की तम्मना किसको नहीं होती भला
सलाम है इस जज्बे को
जो इस जीवन को बनाये रखने के लिए
लगाये हुए है जी जान
कौन देगा रोटी
कौन देगा कपड़ा
है कोई फ़रिश्ता इस चित्र को
बदलने की क्षमता रखने वाला
ये तो एक बानगी है
हिंदुस्तान ही नहीं
विश्व के हर कोने में
मिल जायेंगी ऐसी जिन्दी लाशें
जिन्हें जिन्दा रहते पहनने को लत्ता नहीं
खाने को रोटी नहीं
मरने के बाद के कफन का एक हिस्सा
जिन्दा रहते मिल जाता तो
चिता की तपिस का क्या करना
एक लकड़ी मिल जाती सहारे के लिए
कुछ जलाने के लिए
कुछ पकाने के लिए
पेट में तो अब आग रही नहीं
देह की आग तो अब जलने से रही
रिश्ते जो ढूंढते हैं
वो मुझमें बचा नहीं
ना चमड़ी ना दमड़ी
कुछ बचा नहीं, नोचने को
खसोटने को
बस बचा है तो
ये खोकला हड्डियों का ढांचा
जिसे कोई ढोना नहीं चाहता
न रिश्ते न भाव न प्रेम न वासना
सब के लिए हो चूका यह देह निरर्थक
बस सार्थक है आज ,मेरी मजबूरी
जो मुझे जिन्दा रहने के लिए
उर्जा दे रही है

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
08:25am/13/12/14
©प्रतीक©




गुलदस्ता

●गुलदस्ता●

इक बूँद इश्क की
इस समन्दर में भी डाल दो
इन खारे हो चुके
भावों में भी मिस्री सी घोल दो

मत पालो नफ़रतें
खुशहाली का जायका डाल दो
बिखरे हैं फूल जो
उन्हें चुन चुन कर माला में गूँथ दो

महका दो खुशबु
इस बगिया को प्यार से संवार दो
शुष्क हो चुकीं कलियाँ
अपने प्रेम जल से सींच जीवन दो

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
©प्रतीक
07:18pm12/12/14

Thursday, 11 December 2014

नदी से भाव

●नदी से भाव●

बह रही थी नदी
पाहनों से टकराते हुए,
छलकते हुए
कुछ ऐसे ही थे मेरे भाव
जो टकरा रहे थे
उन बिडंबनाओं से
उन रुढियों से
जो मुझे मानव होने से रोकती हैं
देखता हूँ इस नदी की गती
जो बह रही है
अपनी चाल पर
पर कुछ किनारे बदल रहे थे
उसकी ढाल
मजबूर कर रहे थे
रास्ता बदलने को
जैसे मुझसे कोई कह दे
तेरा रास्ता तू नहीं
कोई और बनाएगा
नदी चली जा रही है।
बिना किसी की परवाह करे
अगले पड़ाव को पार करने की होड़
हर जल बिंदु मचल रही हो जैसे
सागर में समा जाने को।
उस सागर में
जहां उसका अस्तित्व ,ना के बराबर होगा।
फिर भी चाहिए उसे मंजिल
अपने को समर्पित कर देना
आसान नहीं है
मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं
नदी का वेग बढ़ता चला गया
ज्यो ज्यों घाटी नजदीक आने लगी
कुछ यों ही मेरे भाव भी उतावले थे
उस समतल को पाने के लिए
जहाँ सब समान हों
जहाँ कोई किसी का रास्ता न रोके

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
02:24 pm/11/12/14

Wednesday, 10 December 2014

प्रतीकनामा

1-●●नींव●●

कभी कभी सोचता हूँ
छोड़ दूँ
इस दुनिया और दुनियादारी को
अपना लूँ उस दर्शन को
जो रचा मेरे पूर्वजों ने
फिर देखता हूँ पीछे
कुछ दीखता ही नहीं
शायद मेरे में उसे देखने की शक्ति न रही
या में देखना नहीं चाहता
भौतिकता का लबादा ओढ़ा ही नहीं
अपना भी लिया है
बहुत कुछ छोड़ दिया मैंने
यह कहकर कि
ये दकियानूसी बिचार थे
अशिक्षित लोग थे
पर आज भी मौन होकर
उन्ही बिचारों को खोलता और बंद करता हूँ
उस पूंजी की तरह जिसका आज के
बाजार में कोई मूल्य ही नहीं
उस किसान की तरह जिसके पास अदरक तो है
पर उसकी औकात को समझने वाळा कोई नहीं
सोचता हूँ जो नए विचार आये हैं
चाइनिज बाजार से आयातित
उनको आने की जगह भी तो
उन्ही बिचारे विचारों ने दी होगी
आज देखता हूँ
नग्नता देह की ही नहीं
मन की नग्नता भी कम नहीं है
उतावला पन खुद को परोशने का
और किसी को खाने का
उन पुरानी रीतियों नीतियों को सिरे से नकारने का
मैंने भी आजकल यही बीड़ा उठाया है
पर क्यों उठाया है
मुझे पता नहीं
कोसते हैं तालिबान की वादियों को
कभी खुद की गिरेबान नहीं पकड़ना चाहा
उतारने में मजा आता है
दुसरे की इज्जत
बड़ा दिखने की होड़ सी है
न जाने कितने बड़े बन जायेंगे हम
बिना नींव की दीवार पर खड़े होकर
दिवार कब तक बन सकते हैं
कहीं न कहीं
हमारी नीव तो वही पुराने बिचार ही हैं
विश्वगुरु बनने के लिए लालायित
पर गुरुता बची कहाँ है प्रतीक

डाँ.गिरीश पाण्डेय प्रतीक
डीडीहाट पिथोरागढ़
उत्तराखंड

2-{कलम और कला}~

कौन कहता है
कला और कलम में दम नहीं
कलम में बहने वाली स्याही
रक्त से कहीं भी कम नहीं
जो प्यास कलम को है
वो आदमी को कहाँ
इतिहास और हास
भूगोल और गोल
भाषा और आशा
सब तो है
इस कलम की स्याही में
स्याह पन्ने भी हैं
कुछ जो खुले ही नहीं
जो साथ दर्द को कलम ने दिया
वो और कौन दे पाता
उसी स्याही ने बहाई हैं नदियाँ
प्रेम की,
बांधे हैं बाँध
उन आनगिनत सैलाबों के
जो तबाही मचाने को मचल रहे थे
सरहदों की दुरियाँ
दिलों की दूरियों से कम हैं
गोलियां गोल्लकौं में मिल जायेंगी
स्याही तो मिलेगी दवात में
कलम में
चित्र में
चलचित्र में
बहुत दमदार होती है कलम और कला
बस उसे चलाने वाला
कलाकार ,बस कलाकार हो
धर्म या सम्प्रदाय का नहीं
हदों और सरहदों का नहीं
बस इंसान हो
इंसान ,सुना ना इंसान

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
06/12/14/07:53 pm

3-°°करीब आओ°°

कितना आसान है
पहाड़ को कहना और सुनना
कितना मनभावन है
पहाड़ को निहारना और सोचना
क्या कभी सूनी वेदना
इन हरी भरी वादियों की
सुनोगे भी कैसे
क्योंकि ये सुनाता ही नहीं
बस घुटता रहता है खुद मैं
जीना और मरना
ये नहीं जानता
बस जीने का सामान जरूर देता है
बहुत कुछ है जो
इसके भीतर उबल रहा है
पर दूध सा उफान नहीं है इसमें
समझे न में कहना क्या चाह रहा हूँ
पहाड़ पर खड़े होके कभी
पहाड़ को देखना
फिर कभी उन घाटियों को भी परखना जो
हमारे मन सी गहराई लिए हुए हैं
में कैसे कह दूँ
पहाड़ खूब सूरत है
उन खाइयों से पूछो ना
गहराई और ऊंचाई में फर्क क्या है
उन शिखरों से पूछो शिखर पर
उसको कैसा महसूस होता है
अनुमान का धरातल
यथार्थ के सपनों सा ही है
बहुत कुछ जिन्दा है
इन पाहनों के भीतर
जो सुनाई नहीं देता
दिखाई नहीं देता
बस महसूस किया जा सकता है
ये पेड़ ऐसे ही नहीं टिके है
वर्षों से आज तक
न जाने कब तक
इनके स्वप्न स्वप्न ही रहेंगे
हकीकत के बहुत दूर है
जैसे मेरे दिवा स्वप्न
पहाड़ को देखो पहाड़ आकर
मधुर गीत
हुस्न पहाडों का
सुना होगा
गीतकार के शब्दों को नमन
पहाड़ को गुनगुनाने को मजबूर किया
पर पहाड़ तो खुद मजबूर है
अस्त व्यस्त है
अन्दर से पस्त है
फिर भी मुस्कुराता है
न जाने क्यों
क्या मजबूरी है?????

डॉ गिरीश पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
कुछ दार्शनिक सा मन
10:14am/30/11/14