●●●●●●●करीब आओ●●●●●●●●●
क्यों दूर हो तुम हमसे, जरा करीब आओ
क्यों मजबूर हो खुद से, जरा करीब आओ
न भागो यों महफिल से,अंगुलियाँ उठेंगी
क्यों बेजार हो हमसे, जरा करीब आओ
ये आँखें बोल देती हैं सच, दिल का जरूर
क्यों बेखबर हो खुद से,जरा करीब आओ
मत कुरेदो जमीं को,बहुत शख्त है ये जमीं
क्यों खंजर हो खुद के,जरा करीब आओ
मत बहाओ आँसू ,बीते हुए कल के लिए तुम
क्यों अन्दर हो प्रतीक,जरा बाहर तो आओ
डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
01:15pm//13/12/14
©प्रतीक©
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