Sunday, 21 December 2014

फिर भी तू मेरा

●●●●●●●फिर भी तू मेरा●●●●●●●●●●

तू भूल गया मेरे हाथों की रोटी को तो मैं क्या करूँ
तू डोल गया जिन्दगी की आँधी में,तो मैं क्या करूँ

पल्लू की गाँठ आज भी बँधी रहती है तेरे लिए
तू खोल नहीं पाया मन की गाँठ तो मैं क्या करूँ

शाम होते ही नाम तेरा आ ही जाता है एक बार
तू मेरे नाम को ही भूल गया तो मैं क्या करूँ

जिया है तुझे वर्षों से अपनी यादों में हर दम
तू अब उनमें न रहना चाहे तो उनका मैं का क्या करूं

रीझा करता था मेरी आहट पर कभी तू याद कर
अब खीजा करता है,मेरे साये से तो मैं क्या करूँ

तेरा तुतलाना तेरा बचकाना रह रह के गुदगुदाता है मुझे
अब तेरा बचपन,बड़कपन में बदल गया तो मैं क्या करूँ

बहुत कुछ था तेरे मेरे बीच में जो कह नहीं सकते
प्रतीक उनमें से कुछ न रहा तेरे पास तो मैं क्या करूँ

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
उत्तराखंड पिथोरागढ़
06:45am//21//12//14
©प्रतीक©

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