Monday, 22 December 2014

केमरे का सच

●●केमरे पर सच●●

वो बैठकर बतिया रहे थे
केमरा ऑफ़ था
उस समय स्टूडियो का
बात बहुत गम्भीर थी
लगा कितने अच्छे हैं ये लोग
कितना सोचते हैं
ये सब देश दुनियां के बारे में
जैसे ये सच उगलना चाह रहे हों
पार्टी से उपर उठकर
नैतिकता की दुहाई दे रहे थे सब
लगा देश में बड़े विचार शील लोग विचरण करते हैं
कोई नहीं रोक सकता
भारत को विश्वगुरु बनने से
पर विडम्बना
एक घटना ने
बदल दिए
सारे समीकरण
बाणी और बदन के
मायने निकलने लगे चिन्हों के
रस टपकने लगा झंडों से
झंडों के रंग जुबान को रंगने लगे
सब राग अलापने लगे
खुद को बताने लगे बीतराग
घटना थी
केमरे का ऑन होना
और नेतिकता का ऑफ़ होना
जाग गयी थी
छठी इन्द्रीय उस होस्ट की
दाग रहा था
प्रश्नों के हथगोले
लगा आज तो खुलेगी कलई
सांपों की तरह बिष बमन जारी था
जो पहले सपेरे लग रहे थे
वो खुद सांप बन गए थे
बारूद तो इतना भरा था की
जैसे देस अपनी सीमओं की रक्षा हेतु यहीं से लिया जाता है बारूद
बात शुरू हुई गरीबी की
एसी में बैठकर
सामने रखा चिकन बिरयानी
बात हो रही थी भुखमरी की
सब कुछ
कथनी और करनी में फर्क कर रहा था
बातें जो केमरे के पीछे हुईं थीं
वो बहुत पीछे छूट गयीं थीं
इतना पीछे की
कहीं केमरे न सुन ले असलियत को
इतना डर था
अरे भाई सुन भी लिया तो
एडिट वाला आप्सन तो है ही ना
तो डर कैसा
बड़ा मजा आता है इनको
केमरे के सामने
भुखमरी,गरीबी,बेरोजगारी
और तो और मौत तो सबसे बड़ा मसाला है
केमरे के लिए
इस देस में जनता को कब तक बेवकूफ समझा जाएगा
एक बात बता दूँ
अब मैं अर्थात जनता अब बेवकूफ नहीं
ये पब्लिक है सब जानती है

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
01:38pm//22//12//14//सोमबार
©प्रतीक©

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