सम्पादक महोदया को प्रणाम।इस सेवा को स्वीकार करने का कष्ट करें ।
यह रचना नितांत मौलिक है
●चीखता चित्र ●
कुछ चित्र मजबूर कर देते हैं
सोचने को
विवश कर देते हैं
कलम थामने को
भाव उद्वेलित हो जाते है
एक पीड़ा जो
एक टीस
एक दर्द भरी आह मजबूर है
फूट फूट कर रोने को
जज्बात पिघल जाते हैं
पत्थर दिलों के भी
अगर एसा है तो
ये बुढ़ापा ऐसे क्यों पड़ा है
सड़क किनारे
पिस जाने को
कहाँ गए प्रेम के गीत
कहाँ हैं आज वो गुलाब की पंखुड़ियाँ
क्या वो एक मात्र जरिया थे
देह को पाने को
कहाँ हैं वो लाडले
जिनकी नहीं होती थी रात
नहीं होता था दिन
इस माँ के बिना
जीने की तम्मना किसको नहीं होती भला
सलाम है इस जज्बे को
जो इस जीवन को बनाये रखने के लिए
लगाये हुए है जी जान
कौन देगा रोटी
कौन देगा कपड़ा
है कोई फ़रिश्ता इस चित्र को
बदलने की क्षमता रखने वाला
ये तो एक बानगी है
हिंदुस्तान ही नहीं
विश्व के हर कोने में
मिल जायेंगी ऐसी जिन्दी लाशें
जिन्हें जिन्दा रहते पहनने को लत्ता नहीं
खाने को रोटी नहीं
मरने के बाद के कफन का एक हिस्सा
जिन्दा रहते मिल जाता तो
चिता की तपिस का क्या करना
एक लकड़ी मिल जाती सहारे के लिए
कुछ जलाने के लिए
कुछ पकाने के लिए
पेट में तो अब आग रही नहीं
देह की आग तो अब जलने से रही
रिश्ते जो ढूंढते हैं
वो मुझमें बचा नहीं
ना चमड़ी ना दमड़ी
कुछ बचा नहीं, नोचने को
खसोटने को
बस बचा है तो
ये खोकला हड्डियों का ढांचा
जिसे कोई ढोना नहीं चाहता
न रिश्ते न भाव न प्रेम न वासना
सब के लिए हो चूका यह देह निरर्थक
बस सार्थक है आज ,मेरी मजबूरी
जो मुझे जिन्दा रहने के लिए
उर्जा दे रही है
डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
●नदी से भाव●
बह रही थी नदी
पाहनों से टकराते हुए,
छलकते हुए
कुछ ऐसे ही थे मेरे भाव
जो टकरा रहे थे
उन बिडंबनाओं से
उन रुढियों से
जो मुझे मानव होने से रोकती हैं
देखता हूँ इस नदी की गती
जो बह रही है
अपनी चाल पर
पर कुछ किनारे बदल रहे थे
उसकी ढाल
मजबूर कर रहे थे
रास्ता बदलने को
जैसे मुझसे कोई कह दे
तेरा रास्ता तू नहीं
कोई और बनाएगा
नदी चली जा रही है।
बिना किसी की परवाह करे
अगले पड़ाव को पार करने की होड़
हर जल बिंदु मचल रही हो जैसे
सागर में समा जाने को।
उस सागर में
जहां उसका अस्तित्व ,ना के बराबर होगा।
फिर भी चाहिए उसे मंजिल
अपने को समर्पित कर देना
आसान नहीं है
मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं
नदी का वेग बढ़ता चला गया
ज्यो ज्यों घाटी नजदीक आने लगी
कुछ यों ही मेरे भाव भी उतावले थे
उस समतल को पाने के लिए
जहाँ सब समान हों
जहाँ कोई किसी का रास्ता न रोके
डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
●मुक्ति जो मिलती नहीं●
जो ये मेरे माथे के बल है ना
इन्हें मजबूरी मत समझना
बहुत कुछ है इनके पीछे
जो कहा नहीं जा सकता
जो ये मेरे चेहरे की झुर्रियाँ हैं ना
इन्हें हलके में मत लेना
ये बुढापा तो है ही
इन झुर्रियों के पीछे जो इतिहास हैं ना
शब्दों में नहीं कहा जा सकता
जो ये झुकी कमर देख रहे हो ना
इसे यों ही ना नकार देना
तुझे ढकते ढकते ही तो झुकी है
कुछ उम्र का बोझ भी है
फिर भी झुकना तो मेरे संस्कारों में रहा है
जिसे कूबड़ नहीं कहा जा सकता
जो ये लाठी है ना
ये तो वही कर रही है
जो तुझे करना है
अफ़सोस तू लाठी भी नहीं बन सकता
आज जिस देह की गंध बुरी लगती है ना
उसी देह में तुझसे पुष्प खिले
में गुलकंद नहीं बन शकती
अगर बन पाती
तो शायद तू इस तरह दुत्कारता नहीं
मैं आज भी बाँध लाती हूँ
गुड़ की डली
इस फटी धोती के आंचल में
पर अब तू उस तरह मेरे पास नहीं आता
जिस तरह बचपन में आता था
तुझे पता है
एक दिन सबको इसी रस्ते जाना है
इन सब दुश्वारियों से गुजरते हुए
मैं ना जाने क्यों
भीख माँगती हूँ
पर आज तेरे लिए नहीं
अपनी मुक्ति के लिए
डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
परिचय-डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय( प्रतीक)
ग्राम- बगोटी पो-बगोटी चम्पावत
सम्प्रति-शिक्षा विभाग उत्तराखंड में अध्यापन कार्य में संलग्न।
प्रथम काव्य संग्रह-आईना प्रकाशित
अन्य-क्षेत्रीय,राष्ट्रिय पत्र पत्रिकाओं में लेख व कविताएँ प्रकाशित।
यह रचना नितांत मौलिक है
●चीखता चित्र ●
कुछ चित्र मजबूर कर देते हैं
सोचने को
विवश कर देते हैं
कलम थामने को
भाव उद्वेलित हो जाते है
एक पीड़ा जो
एक टीस
एक दर्द भरी आह मजबूर है
फूट फूट कर रोने को
जज्बात पिघल जाते हैं
पत्थर दिलों के भी
अगर एसा है तो
ये बुढ़ापा ऐसे क्यों पड़ा है
सड़क किनारे
पिस जाने को
कहाँ गए प्रेम के गीत
कहाँ हैं आज वो गुलाब की पंखुड़ियाँ
क्या वो एक मात्र जरिया थे
देह को पाने को
कहाँ हैं वो लाडले
जिनकी नहीं होती थी रात
नहीं होता था दिन
इस माँ के बिना
जीने की तम्मना किसको नहीं होती भला
सलाम है इस जज्बे को
जो इस जीवन को बनाये रखने के लिए
लगाये हुए है जी जान
कौन देगा रोटी
कौन देगा कपड़ा
है कोई फ़रिश्ता इस चित्र को
बदलने की क्षमता रखने वाला
ये तो एक बानगी है
हिंदुस्तान ही नहीं
विश्व के हर कोने में
मिल जायेंगी ऐसी जिन्दी लाशें
जिन्हें जिन्दा रहते पहनने को लत्ता नहीं
खाने को रोटी नहीं
मरने के बाद के कफन का एक हिस्सा
जिन्दा रहते मिल जाता तो
चिता की तपिस का क्या करना
एक लकड़ी मिल जाती सहारे के लिए
कुछ जलाने के लिए
कुछ पकाने के लिए
पेट में तो अब आग रही नहीं
देह की आग तो अब जलने से रही
रिश्ते जो ढूंढते हैं
वो मुझमें बचा नहीं
ना चमड़ी ना दमड़ी
कुछ बचा नहीं, नोचने को
खसोटने को
बस बचा है तो
ये खोकला हड्डियों का ढांचा
जिसे कोई ढोना नहीं चाहता
न रिश्ते न भाव न प्रेम न वासना
सब के लिए हो चूका यह देह निरर्थक
बस सार्थक है आज ,मेरी मजबूरी
जो मुझे जिन्दा रहने के लिए
उर्जा दे रही है
डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
●नदी से भाव●
बह रही थी नदी
पाहनों से टकराते हुए,
छलकते हुए
कुछ ऐसे ही थे मेरे भाव
जो टकरा रहे थे
उन बिडंबनाओं से
उन रुढियों से
जो मुझे मानव होने से रोकती हैं
देखता हूँ इस नदी की गती
जो बह रही है
अपनी चाल पर
पर कुछ किनारे बदल रहे थे
उसकी ढाल
मजबूर कर रहे थे
रास्ता बदलने को
जैसे मुझसे कोई कह दे
तेरा रास्ता तू नहीं
कोई और बनाएगा
नदी चली जा रही है।
बिना किसी की परवाह करे
अगले पड़ाव को पार करने की होड़
हर जल बिंदु मचल रही हो जैसे
सागर में समा जाने को।
उस सागर में
जहां उसका अस्तित्व ,ना के बराबर होगा।
फिर भी चाहिए उसे मंजिल
अपने को समर्पित कर देना
आसान नहीं है
मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं
नदी का वेग बढ़ता चला गया
ज्यो ज्यों घाटी नजदीक आने लगी
कुछ यों ही मेरे भाव भी उतावले थे
उस समतल को पाने के लिए
जहाँ सब समान हों
जहाँ कोई किसी का रास्ता न रोके
डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
●मुक्ति जो मिलती नहीं●
जो ये मेरे माथे के बल है ना
इन्हें मजबूरी मत समझना
बहुत कुछ है इनके पीछे
जो कहा नहीं जा सकता
जो ये मेरे चेहरे की झुर्रियाँ हैं ना
इन्हें हलके में मत लेना
ये बुढापा तो है ही
इन झुर्रियों के पीछे जो इतिहास हैं ना
शब्दों में नहीं कहा जा सकता
जो ये झुकी कमर देख रहे हो ना
इसे यों ही ना नकार देना
तुझे ढकते ढकते ही तो झुकी है
कुछ उम्र का बोझ भी है
फिर भी झुकना तो मेरे संस्कारों में रहा है
जिसे कूबड़ नहीं कहा जा सकता
जो ये लाठी है ना
ये तो वही कर रही है
जो तुझे करना है
अफ़सोस तू लाठी भी नहीं बन सकता
आज जिस देह की गंध बुरी लगती है ना
उसी देह में तुझसे पुष्प खिले
में गुलकंद नहीं बन शकती
अगर बन पाती
तो शायद तू इस तरह दुत्कारता नहीं
मैं आज भी बाँध लाती हूँ
गुड़ की डली
इस फटी धोती के आंचल में
पर अब तू उस तरह मेरे पास नहीं आता
जिस तरह बचपन में आता था
तुझे पता है
एक दिन सबको इसी रस्ते जाना है
इन सब दुश्वारियों से गुजरते हुए
मैं ना जाने क्यों
भीख माँगती हूँ
पर आज तेरे लिए नहीं
अपनी मुक्ति के लिए
डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
परिचय-डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय( प्रतीक)
ग्राम- बगोटी पो-बगोटी चम्पावत
सम्प्रति-शिक्षा विभाग उत्तराखंड में अध्यापन कार्य में संलग्न।
प्रथम काव्य संग्रह-आईना प्रकाशित
अन्य-क्षेत्रीय,राष्ट्रिय पत्र पत्रिकाओं में लेख व कविताएँ प्रकाशित।
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