Saturday, 20 December 2014

दीवार दिल की


●दीवार दिल की●

चाहर दिवारी में लगे फूलों फलों
की सुगंध और स्वाद
पूछती नहीं दीवार को
जो दीवार से बंधे दिल हैं न
उनमें खडी दीवार
अभेद्य ही नहीं अदृश्य भी है
पेड़ के पत्ते भी गिरते ,और फडफडाते हैं
मेरे ही आँगन में हैं
ये दिल की दुरियाँ, इन पत्तों को नहीं रोक सकती
हाँ पेड़ ही कट जाय तो बात अलग है
सरहदों पर जो गोलियां चलती हैं
वो नहीं पूछती
बन्दूक तेरी या मेरी
जान की कीमत उस घोड़े को क्या पता
जो चलता है
दूसरे की अंगुलियों से
बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से आय
सुना ही है या गुना भी है कभी
उन बच्चों से क्या पूछें
जो चले गए
इस दुनिया से रो रो कर
विलखते हुए
तेरी हदों का असर हमारी सरहदों
पर तो पड़ता ही है
क्या करोगे अब
जब भस्मासुर एक नहीं अनेक हों
जिनको बरदान ,जीवन दान भी
तूने ही दिया हो
अभी भी समय है
अपने बागों में फलदार पेड़ लगाओ
हथगोले,बन्दूक,और गोलियों की फसल नहीं
मत बनाओ मानव को, मानव का दुश्मन
घरों को घर बनाओ
ताबूत और कब्रगाह नहीं
स्कूल ,स्कूल ही रहें
बिषबमन के अड्डे नहीं
तालीम जीने की दो
जिन्दा जलाने की नहीं
मत बाँटो जहर से भरी रेवड़ियों को
जरा बाँट लो प्रेम को
अपने नापाक इरादों को त्याग दो
नहीं तो एक दिन अपने वजूद को ढूढना मुश्किल होगा
तू खुश रहेगा तो पड़ोसी भी खुश रहेगा
समझे ना

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
डायरी के पन्ने
©प्रतीक©




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