Tuesday, 23 December 2014

भूख

●●भूख रेस्टोरेंट में●●

वो चित्र को देख रहा था
और बार बार थूक निगल रहा था
उस रेस्टोरेंट के विशाल काय होर्डिंग पर
छपे पिज़्ज़ा,बर्गर,डोसा
और भी न जाने क्या क्या
वो बस देख ही सकता था
दूर से ही
नजदीक कौन आने देता उसे
क्योकि वो भूखा था और साथ में नंगा भी
पर देखता जरूर था
रोज
क्योंकि उस रेस्टोरेंट के ग्राहक ही
उसके भी जीवन के वाहक थे
कोई डकार मारकर फटकार जाता
कोई एक सिक्का खनकाकर
रहम कर जाता
और ना जाने क्या क्या बुदबुदाकर नाक भींचकर आगे बढ़ जाता
और नसीहत भी दे जाता
कुछ काम करो
वो कहता अरे भाई ये भी तो काम ही है
ऐसे भूखे नंगों की जेब से एक सिक्का निकालना
आसान है क्या
ये क्या जानें वास्तव में नंगापन होता क्या है
रोटी कपड़ा
यही तो है असली रगडा
राजनीती कूटनीति के बड़े बड़े दावे इसी के आस पास पाए जाते हैं
वाह वाही लूटने का सबसे सस्ता हथकंडा
दुसरे को भूखा नंगा कहना आसान है
वो आज बहुत खुश था
न जाने क्यों
पता चला आज मंगल बार था
बगल के मंदिर में हनुमान जी भक्तों का ताँता लगेगा
दिन भर भूखे रहकर
जिसे ब्रत भी कहते हैं
उसका फल प्राप्त हो इसलिए
बूंदी का प्रसाद चढाने
आज तो पेट भी खुश हो जाएगा
हफ्ते में एक दिन कुछ मीठा खाने का अवसर
मीठा सुनने का नहीं
सिक्कों की खनखनाहट
घंटियों की टन टन
कानों को न जाने भाती नहीं
बगल से आती अजान की आवाज
गुरुबानी ये सब
भूख को अच्छे नहीं लगते
उसे तो चाहिए
अन्न जल कण
वो किसी धर्म संप्रदाय जाती का क्यों न हो
वो फिर देखने उस चित्र में
ना जाने क्या
बहुत कुछ था उसमे जो उसे नहीं
उसके उदर पूर्ती को चाहिए था
जब वो ये सब सोच रहा था आसमान को देखकर
असमान हो गया था उसका चेहरा
जब नीचे देखा तो
जो बचा भी था
वो भी अब उसके पास न था
कोई स्वान बगल में बैठकर पूँछ हिला रहा था
और वो उसे देखकर
बहुत देर तक हँसता रहा
हँसता रहा हँसता रहा
शायद वो अब भी हंस रहा हो

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
08:38pm//23//12//14
©प्रतीक©

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