Friday, 12 December 2014

गुलदस्ता

●गुलदस्ता●

इक बूँद इश्क की
इस समन्दर में भी डाल दो
इन खारे हो चुके
भावों में भी मिस्री सी घोल दो

मत पालो नफ़रतें
खुशहाली का जायका डाल दो
बिखरे हैं फूल जो
उन्हें चुन चुन कर माला में गूँथ दो

महका दो खुशबु
इस बगिया को प्यार से संवार दो
शुष्क हो चुकीं कलियाँ
अपने प्रेम जल से सींच जीवन दो

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
©प्रतीक
07:18pm12/12/14

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