1-●●नींव●●
कभी कभी सोचता हूँ
छोड़ दूँ
इस दुनिया और दुनियादारी को
अपना लूँ उस दर्शन को
जो रचा मेरे पूर्वजों ने
फिर देखता हूँ पीछे
कुछ दीखता ही नहीं
शायद मेरे में उसे देखने की शक्ति न रही
या में देखना नहीं चाहता
भौतिकता का लबादा ओढ़ा ही नहीं
अपना भी लिया है
बहुत कुछ छोड़ दिया मैंने
यह कहकर कि
ये दकियानूसी बिचार थे
अशिक्षित लोग थे
पर आज भी मौन होकर
उन्ही बिचारों को खोलता और बंद करता हूँ
उस पूंजी की तरह जिसका आज के
बाजार में कोई मूल्य ही नहीं
उस किसान की तरह जिसके पास अदरक तो है
पर उसकी औकात को समझने वाळा कोई नहीं
सोचता हूँ जो नए विचार आये हैं
चाइनिज बाजार से आयातित
उनको आने की जगह भी तो
उन्ही बिचारे विचारों ने दी होगी
आज देखता हूँ
नग्नता देह की ही नहीं
मन की नग्नता भी कम नहीं है
उतावला पन खुद को परोशने का
और किसी को खाने का
उन पुरानी रीतियों नीतियों को सिरे से नकारने का
मैंने भी आजकल यही बीड़ा उठाया है
पर क्यों उठाया है
मुझे पता नहीं
कोसते हैं तालिबान की वादियों को
कभी खुद की गिरेबान नहीं पकड़ना चाहा
उतारने में मजा आता है
दुसरे की इज्जत
बड़ा दिखने की होड़ सी है
न जाने कितने बड़े बन जायेंगे हम
बिना नींव की दीवार पर खड़े होकर
दिवार कब तक बन सकते हैं
कहीं न कहीं
हमारी नीव तो वही पुराने बिचार ही हैं
विश्वगुरु बनने के लिए लालायित
पर गुरुता बची कहाँ है प्रतीक
डाँ.गिरीश पाण्डेय प्रतीक
डीडीहाट पिथोरागढ़
उत्तराखंड
2-{कलम और कला}~
कौन कहता है
कला और कलम में दम नहीं
कलम में बहने वाली स्याही
रक्त से कहीं भी कम नहीं
जो प्यास कलम को है
वो आदमी को कहाँ
इतिहास और हास
भूगोल और गोल
भाषा और आशा
सब तो है
इस कलम की स्याही में
स्याह पन्ने भी हैं
कुछ जो खुले ही नहीं
जो साथ दर्द को कलम ने दिया
वो और कौन दे पाता
उसी स्याही ने बहाई हैं नदियाँ
प्रेम की,
बांधे हैं बाँध
उन आनगिनत सैलाबों के
जो तबाही मचाने को मचल रहे थे
सरहदों की दुरियाँ
दिलों की दूरियों से कम हैं
गोलियां गोल्लकौं में मिल जायेंगी
स्याही तो मिलेगी दवात में
कलम में
चित्र में
चलचित्र में
बहुत दमदार होती है कलम और कला
बस उसे चलाने वाला
कलाकार ,बस कलाकार हो
धर्म या सम्प्रदाय का नहीं
हदों और सरहदों का नहीं
बस इंसान हो
इंसान ,सुना ना इंसान
डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
06/12/14/07:53 pm
3-°°करीब आओ°°
कितना आसान है
पहाड़ को कहना और सुनना
कितना मनभावन है
पहाड़ को निहारना और सोचना
क्या कभी सूनी वेदना
इन हरी भरी वादियों की
सुनोगे भी कैसे
क्योंकि ये सुनाता ही नहीं
बस घुटता रहता है खुद मैं
जीना और मरना
ये नहीं जानता
बस जीने का सामान जरूर देता है
बहुत कुछ है जो
इसके भीतर उबल रहा है
पर दूध सा उफान नहीं है इसमें
समझे न में कहना क्या चाह रहा हूँ
पहाड़ पर खड़े होके कभी
पहाड़ को देखना
फिर कभी उन घाटियों को भी परखना जो
हमारे मन सी गहराई लिए हुए हैं
में कैसे कह दूँ
पहाड़ खूब सूरत है
उन खाइयों से पूछो ना
गहराई और ऊंचाई में फर्क क्या है
उन शिखरों से पूछो शिखर पर
उसको कैसा महसूस होता है
अनुमान का धरातल
यथार्थ के सपनों सा ही है
बहुत कुछ जिन्दा है
इन पाहनों के भीतर
जो सुनाई नहीं देता
दिखाई नहीं देता
बस महसूस किया जा सकता है
ये पेड़ ऐसे ही नहीं टिके है
वर्षों से आज तक
न जाने कब तक
इनके स्वप्न स्वप्न ही रहेंगे
हकीकत के बहुत दूर है
जैसे मेरे दिवा स्वप्न
पहाड़ को देखो पहाड़ आकर
मधुर गीत
हुस्न पहाडों का
सुना होगा
गीतकार के शब्दों को नमन
पहाड़ को गुनगुनाने को मजबूर किया
पर पहाड़ तो खुद मजबूर है
अस्त व्यस्त है
अन्दर से पस्त है
फिर भी मुस्कुराता है
न जाने क्यों
क्या मजबूरी है?????
डॉ गिरीश पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
कुछ दार्शनिक सा मन
10:14am/30/11/14
आपकी कलम की खूबसूरती का क्या कहना.....
ReplyDeleteआभार भाई
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