Thursday, 11 December 2014

नदी से भाव

●नदी से भाव●

बह रही थी नदी
पाहनों से टकराते हुए,
छलकते हुए
कुछ ऐसे ही थे मेरे भाव
जो टकरा रहे थे
उन बिडंबनाओं से
उन रुढियों से
जो मुझे मानव होने से रोकती हैं
देखता हूँ इस नदी की गती
जो बह रही है
अपनी चाल पर
पर कुछ किनारे बदल रहे थे
उसकी ढाल
मजबूर कर रहे थे
रास्ता बदलने को
जैसे मुझसे कोई कह दे
तेरा रास्ता तू नहीं
कोई और बनाएगा
नदी चली जा रही है।
बिना किसी की परवाह करे
अगले पड़ाव को पार करने की होड़
हर जल बिंदु मचल रही हो जैसे
सागर में समा जाने को।
उस सागर में
जहां उसका अस्तित्व ,ना के बराबर होगा।
फिर भी चाहिए उसे मंजिल
अपने को समर्पित कर देना
आसान नहीं है
मेरे लिए तो बिल्कुल नहीं
नदी का वेग बढ़ता चला गया
ज्यो ज्यों घाटी नजदीक आने लगी
कुछ यों ही मेरे भाव भी उतावले थे
उस समतल को पाने के लिए
जहाँ सब समान हों
जहाँ कोई किसी का रास्ता न रोके

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
पिथोरागढ़ उत्तराखंड
02:24 pm/11/12/14

No comments:

Post a Comment