आज खेत में
हलिया
हल बल्द के साथ
गया था
बड़ी निराशा से
जोड़ा था
दो बैलों को
जुए से
हल को हल्यून से
थामा था हथिण्डा
हाथ में सांकड़ी
लगाने चला था
पहला सी
जमीन बहुत सख्त थी
जैसे हमारा नजरिया
फिर भी डाला था
बीज
आशा का
जिसे दरकार थी
कुछ बादलों के गरजने की
बरसने की
न बादल आया
न बरसा
सूखने लगा था
खेत
खलिहान
हल और हलिया
"प्रतीक"गिरीश चंद्र पाण्डेय
पिथौरागढ़ उत्तराखंड
©gcp©
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