Monday, 1 June 2015

तिनके का सहारा

••सम्हाल लेना••
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कुछ तिनके जो
उड़ रहे हैं
इन अंधड़ों में
उनको सम्हाल लेना
वही तो किनारे लगाएँगे
तुम्हें और तुम्हारे
डूबते काफ़िले को
क्या उन तिनकों को
सहेज पायेगा

सूना होगा
डूबते को तिनके का सहारा
जिसने डूबने की
ठान ली हो
उसे क्या कोई
तिनका बचा पायेगा

निकला था समन्दर को
लाँघने
क्या इतना आसान है?
पूँछ तो तेरे वंशजों ने
पहले ही घिस डाली
किस पर स्थिर हो
तू इस विशाल
जल थल को नभ् तक
ले जा पायेगा

बिजलियों के चमकने दमकने से
घबराना क्या दर्शाता है
क्या तू भादो के
बादलों की गर्जना और तर्जना को
सुन पायेगा

धीर गंभीर
कहे जाने वाली
वो घटाएँ
आज बोझिल हो
तिलमिला उठीं हैं
क्या इन बदलती
फिजाओं में तू जी पायेगा

जीने का हौसला
मरने का फैसला
इन दोनों के बीच की दूरी
जो अगोचर ही
नहीं अगम भी है
अभेद्य तो नहीं कह पाउँगा
क्या इस गुत्थी को
तू कभी सुलझा पायेगा

जेब में हाथ डालकर
चलना
नदी में हाथ बाँध कर कूदना
ये आत्म हत्या नहीं तो
और क्या है
क्या कभी बंद सांकलो को
खोल पायेगा

अब की बार
तू तिनके को यो न उड़ने देना
अपने विवेक को स्थिर कर लेना
किसी की हुड़कियों से न डरना
मौसम को जाँच लेना
परख लेना
जीने के लिए वो सब कुछ कर लेना
जो तू कर सकता है
हाथों को खुला छोड़
चलना और तैरना |
दिमाग के बंद सांकल खोल लेना
तभी कुछ कर पायेगा
और जी पायेगा

डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय "प्रतीक"
उत्तराखंड
©gcp©





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