Tuesday, 2 June 2015

खोटा सिक्का

°°खोटा सिक्का°°
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एक सिक्का
फैंका था
कटोरे में
कटोरा खूब हँसा था
और नाचा भी था
क्योंकि वह सिक्का पहला था

अल्ला
भगवान के नाम पर
लगभग दस दुआओं को
एक साँस में बोल गया था
तब जाकर
पिघला था
जेब से बटुआ निकला था
हर कोने को टटोला था
मिला था
एक सिक्का
बड़ी दूर से घुच्ची की तरह
डाला था
क्योंकि वह सिक्का पहला था

पूरा दिन यों ही
गुजर गया था
बहुत कुछ समेट लिया था
उन दुआओं के बल पर
जिन्हें उसने
ले जाकर शराब की दूकान में
बेच दिया था
अब वही
दुनिया का सबसे बड़ा बादशाह था
क्योंकि वह निकला सिक्का खोटा था

आज फिर
वही जगह
वही समय और आदमी
वही कटोरा
आज सिक्का नदारद है
नए सिक्के की तलाश में
शाम की आस में
हाँ आज वह बटुए वाला न था
क्योंकि वह सिक्का रूठा था
आदमी झूठा था

"प्रतीक"डॉ गिरीश चंद्र पाण्डेय
उत्तराखंड पिथौरागढ़
©gcp



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